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शिवराज ने सुनाया मोदी से पहली मुलाकात का किस्सा, लाल चौक की यादें भी कीं साझा

शिवराज मोदी मुलाकात
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शिवराज ने सुनाया मोदी से पहली मुलाकात का किस्सा, लाल चौक की यादें भी कीं साझा

शिवराज मोदी मुलाकात शिवराज सिंह चौहान ने नरेंद्र मोदी से अपनी पहली मुलाकात और श्रीनगर के लाल चौक से जुड़ी यादगार घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने पुराने राजनीतिक दिनों के अनुभव साझा करते हुए कई रोचक बातें बताईं।

शिवराज मोदी मुलाकात

हाल ही में दिल्ली में एक भावुक और यादगार कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जहां केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी नई पुस्तक ‘अपनापन: नरेंद्र मोदी संग मेरे अनुभव’ का विमोचन किया। इस किताब के लोकार्पण के दौरान शिवराज जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी ३०-३५ साल पुरानी यात्रा को पन्नों से बाहर निकालकर साझा किया। सबसे दिलचस्प रहा उनका वो किस्सा जब उन्होंने मोदी जी से अपनी पहली मुलाकात और १९९१ की एकता यात्रा (Ekta Yatra) की बात की, जिसमें लाल चौक पर तिरंगा फहराने का जज्बा शामिल था।

शिवराज मोदी मुलाकात: 1991 की एकता यात्रा खतरे और जुनून की दास्तां

1991 का साल भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था। श्रीनगर का लाल चौक उग्रवादियों का गढ़ बन चुका था। उस समय किसी के लिए भी कल्पना करना मुश्किल था कि वहां तिरंगा फहराया जा सकेगा। लेकिन भाजपा ने फैसला किया कि देश की एकता का संदेश देने के लिए एकता यात्रा निकाली जाएगी, जो कन्याकुमारी से शुरू होकर श्रीनगर के लाल चौक पर समाप्त होगी।

इस यात्रा की जिम्मेदारी उस समय के युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी को सौंपी गई। शिवराज सिंह चौहान उस यात्रा का हिस्सा थे। उन्होंने किताब विमोचन पर बताया, “जब मैं पहली बार नरेंद्र भाई से मिला, तो उनके भीतर एक जिद, जुनून और जज्बा देखा। वे कहते थे कि तिरंगा सिर्फ लाल चौक पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के दिल में फहराना है।”

यात्रा के दौरान कई चुनौतियां आईं। फगवाड़ा में आतंकियों ने यात्रा में शामिल कार्यकर्ताओं की बस पर हमला किया, जिसमें छह कार्यकर्ता शहीद हो गए। फिर भी यात्रा रुकी नहीं। लाल चौक पहुंचकर तिरंगा फहराने का संकल्प और मजबूत हो गया। शिवराज जी ने याद करते हुए कहा कि मोदी जी पूरे समय कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहे। उन्होंने यात्रा को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अभियान बनाया।

पहली मुलाकात का रोचक किस्सा

शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पहली मुलाकात को विस्तार से साझा किया। १९९१-९२ के आसपास की बात है। मोदी जी उस समय भाजपा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। शिवराज जी ने बताया कि मोदी जी की सोच लोगों तक पहुंचने, उन्हें एकजुट करने और देशभक्ति की भावना जगाने की थी। लाल चौक पर तिरंगा फहराने का कार्यक्रम उस समय अकल्पनीय था, लेकिन मोदी जी के नेतृत्व में यह संभव हुआ।

उन्होंने एक और मजेदार किस्सा सुनाया। एक बैठक में मोदी जी ने पूछा कि आपके पास ईमेल आईडी है? उस समय १९९० के दशक में ज्यादातर लोग ईमेल से अनजान थे। एक नेता ने पूछ लिया, “ईमेल क्या है, फीमेल?” यह सुनकर सब हंस पड़े, लेकिन मोदी जी ने तब ही टेक्नोलॉजी की ताकत समझ ली थी और पार्टी में ईमेल कल्चर शुरू करने की पहल की।

यह किस्सा दर्शाता है कि मोदी जी कितने दूरदर्शी रहे हैं। वे भविष्य की तैयारी पहले से करते थे।

लाल चौक: प्रतीक और प्रेरणा

लाल चौक की यादें आज भी देशवासियों के मन में ताजा हैं। उस समय घाटी में अलगाववाद चरम पर था। सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद तिरंगा फहराना एक साहसिक कदम था। शिवराज जी ने कहा, “मोदी जी का दिल कार्यकर्ताओं के लिए धड़कता है। वे पूरी रात सोए नहीं, बैठे-बैठे रोते रहे।” यह भावुकता दिखाती है कि नेतृत्व सिर्फ कमांड नहीं, बल्कि संवेदनशीलता भी होता है।

आज जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत’ की बात करते हैं, तो उसकी नींव उन दिनों की यात्राओं में दिखती है। लाल चौक पर तिरंगा फहराना सिर्फ झंडा फहराना नहीं था, बल्कि पूरे देश को यह संदेश देना था कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

अपनापन

शिवराज सिंह चौहान की किताब ‘अपनापन’ में सिर्फ किस्से नहीं, बल्कि अनुभव हैं। इसमें मोदी जी को साधक, कर्मयोगी और संवेदनशील इंसान के रूप में दिखाया गया है। शिवराज जी ने बताया कि मोदी जी कार्यकर्ताओं को सालों बाद भी याद रखते हैं। वे उनके नाम, परिवार और छोटी-छोटी बातें याद रखते हैं।

यह किताब भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर मेहनत, समर्पण और दूरदृष्टि से भरा होता है।

आज के संदर्भ में प्रासंगिकता

आज भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है। कश्मीर में आतंकवाद काफी हद तक नियंत्रित है। Article 370 हटने के बाद विकास की नई लहर आई है। लाल चौक अब शांति और पर्यटन का प्रतीक बन रहा है। शिवराज जी के किस्से हमें याद दिलाते हैं कि सपने बड़े देखने चाहिए और चुनौतियों का सामना करने का साहस रखना चाहिए।

मोदी जी का नेतृत्व आज भी उसी जुनून से प्रेरित है। चाहे किसानों के लिए योजनाएं हों, डिजिटल इंडिया हो, या आत्मनिर्भर भारत—सबमें उस पुरानी एकता यात्रा की भावना झलकती है।

निष्कर्ष

शिवराज सिंह चौहान का यह कार्यक्रम और किताब न सिर्फ व्यक्तिगत यादों का संग्रह है, बल्कि भारतीय राजनीति के एक युग का दस्तावेज है। मोदी-शिवराज का संबंध गुरु-शिष्य, साथी और अपनापन का है। लाल चौक की यादें हमें सिखाती हैं कि राष्ट्रप्रेम में कोई चुनौती बड़ी नहीं होती।

जो कार्यकर्ता आज राजनीति में नए हैं, उनके लिए यह किस्सा प्रेरणा है। सपनों को पूरा करने के लिए जुनून, धैर्य और टीम वर्क जरूरी है। शिवराज जी ने न सिर्फ किस्सा सुनाया, बल्कि एक संदेश भी दिया—अपना देश, अपना अपनापन

यह पुस्तक हर देशभक्त के संग्रह में होनी चाहिए। क्योंकि इसमें सिर्फ दो नेताओं की कहानी नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के उभरते स्वरूप की कहानी है।