SC का बड़ा फैसला: अब राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पास करने की टाइमलाइन तय नहीं होगी!
SC का बड़ा फैसला: अब राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पास करने की टाइमलाइन तय नहीं होगी!
SC का बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है जिसमें अब राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पास करने की कोई निश्चित टाइमलाइन तय नहीं होगी। इस फैसले से संविधान की कार्यकारिणी शक्तियों पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।
SC का बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पास करने की कोई तय टाइमलाइन नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संविधान पीठ के फैसले में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने की कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती है। अदालत ने कहा है कि शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तहत यह समय-सीमा निर्धारित करना संवैधानिक लचीलापन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध होगा।
राष्ट्रपति और राज्यपाल के बिलों पर टाइमलाइन नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के तहत अब इन विधेयकों के अनुमोदन के लिए कोई निश्चित अवधि तय नहीं की जा सकती। राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने निर्णय को लंबित नहीं कर सकते.
पहली बार निर्धारित हुई थी समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मामले में पहली बार राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए निर्णय लेने की तीन महीने की सीमा तय की थी, लेकिन अब यह सीमा नहीं है.
संवैधानिक संदर्भ
कोर्ट ने कहा कि संविधान में कोई ‘सुप्रीम’ नहीं है, यानी कोई भी समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। यह उसकी अदालत की सीमा के बाहर है और संसदीय स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा.
केंद्र सरकार का विरोध
केंद्र सरकार ने कहा है कि इस तरह की समयसीमा संविधान के खिलाफ है
और इससे संवैधानिक व्यवस्था बिगड़ सकती है, साथ ही
न्यायपालिका का कार्यपालिका में हस्तक्षेप भी हो सकता है.
निर्णय का प्रभाव
इस फैसले से सरकार और विधायिकाओं को विधेयकों पर
जल्द निर्णय लेने का दबाव कम हो जाएगा, क्योंकि अब कोई निश्चित समय नहीं है.
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने फैसले में
लचीलापन दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं, और उनके पास फैसले के लिए
कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती.
राज्य सरकारों का स्थान
यह फैसला केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए जरूरी है
कि वे विधेयकों पर अपने निर्णय को जल्द या लंबा खींचने के बीच संतुलित रखें,
यह उनके संवैधानिक अधिकार का हिस्सा है.