TMC में बवाल दिल्ली में हुई एक अहम मुलाकात के बाद टीएमसी में सियासी घमासान तेज हो गया है। महज 13 दिनों के भीतर पार्टी के अंदर बढ़ते विवाद और सत्ता संघर्ष ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आया है। 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद पार्टी में अंदरूनी कलह चरम पर पहुंच गई है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पार्टी, जो लंबे समय तक बंगाल पर राज करती रही, अब महाभारत का शिकार बनती नजर आ रही है।
सिर्फ 13 दिनों के अंदर दिल्ली की एक मुलाकात ने TMC को हिलाकर रख दिया। असंतोष, इस्तीफे, विद्रोह और आरोप-प्रत्यारोप की आंधी ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया। ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि विद्रोही गुट ‘रियल TMC’ का दावा कर रहा है। यह भगदड़ सिर्फ आंतरिक कलह नहीं, बल्कि 15 साल के शासन के बाद सत्ता गंवाने की निराशा और नए समीकरणों का नतीजा है। इस ब्लॉग में हम इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझेंगे।
TMC में बवाल: दिल्ली की मुलाकात
सब कुछ शुरू हुआ दिल्ली में एक अहम मुलाकात से। चुनावी हार के तुरंत बाद TMC के कुछ प्रमुख नेताओं और विधायकों की दिल्ली यात्रा ने पार्टी में हलचल मचा दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई के अंत में हुई इस मुलाकात में विद्रोही स्वर मुखर हुए। कई विधायक केंद्र की BJP सरकार और नए CM सुवेंदु अधिकारी के साथ संवाद की संभावना तलाश रहे थे।
यह मुलाकात महज औपचारिक नहीं थी। इसमें TMC के संगठनात्मक ढांचे, अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और I-PAC जैसी एजेंसियों की भूमिका पर तीखी बहस हुई। ममता बनर्जी ने इसे BJP की साजिश बताया, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि असंतोष पहले से पनप रहा था। हार के 48 घंटे के अंदर ही वरिष्ठ नेता मनोज तिवारी, काकोली घोष दस्तिदार जैसे चेहरे खुलकर सामने आए।
सिर्फ 13 दिनों में यह मुलाकात पार्टी फूट का कारण बन गई। दिल्ली से लौटने के बाद असंतोष सड़क पर उतर आया।
13 दिनों का महाभारत
चुनाव नतीजों के बाद TMC में जो शुरू हुआ, वह 13 दिनों में महाभारत बन गया।
- पहले कुछ दिन: हार के बाद ममता बनर्जी ने कलकत्ता में रणनीति बैठक बुलाई। करीब 60 में से 10-12 विधायक गैर-हाजिर रहे। बैठक रद्द हो गई। ममता ने इसे BJP की साजिश करार दिया।
- विद्रोह का उदय: रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा जैसे नेताओं ने हस्ताक्षर जालसाजी का आरोप लगाया। उन्होंने अभिषेक बनर्जी के करीबी नेताओं पर सवाल उठाए। पार्टी ने उन्हें तुरंत निष्कासित कर दिया, लेकिन यह आग पर घी डालने वाला कदम साबित हुआ।
- विधायकों का विद्रोह: 58 TMC विधायकों ने स्पीकर रथिंद्र बोस से संपर्क किया और रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मानने की मांग की। स्पीकर ने इसे स्वीकार कर लिया, जो TMC के लिए बड़ा झटका था। विद्रोही गुट अब खुद को ‘रियल TMC’ बता रहा है।
- इस्तीफों की बाढ़: 100 से ज्यादा नगर पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया। काकोली घोष दस्तिदार ने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया। संतानु सेन, अरूप चक्रवर्ती जैसे कई वरिष्ठ नेता भी अलग हो गए।
ये 13 दिन TMC की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए। ममता बनर्जी ने सभी कमेटियों को भंग कर दिया और संगठनात्मक overhaul की घोषणा की, लेकिन विश्वास की बहाली मुश्किल दिख रही है।
ममता बनर्जी की चुनौतियां
Mamta बनर्जी पर सबसे बड़ा आरोप परिवारवाद का है। कई विधायक मानते हैं कि पार्टी अब ‘अभिषेक बनर्जी सेंट्रिक’ हो गई है। चुनावी रणनीति में I-PAC की भूमिका और टिकट वितरण में अनियमितताओं को लेकर नाराजगी गहरी है।
ममता ने इसे BJP की ‘महाराष्ट्र मॉडल’ साजिश बताया, लेकिन असंतोष आंतरिक लगता है। सुवेंदु अधिकारी की सरकार में विकास कार्यों के लिए कई TMC नेता उनके साथ बैठकें करने लगे हैं। काकोली घोष दस्तिदार जैसी सीनियर लीडर का सुवेंदु की बैठक में शामिल होना पार्टी के लिए शर्मनाक है।
TMC अब विपक्ष में है। 80 सीटों वाली पार्टी में संगठनात्मक कमजोरी साफ दिख रही है। ममता 8 जून को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की बैठक में शामिल होंगी, जहां वे सहयोगियों से समर्थन मांगेंगी। लेकिन क्या यह पर्याप्त होगा?
TMC का भविष्य: फूट या वापसी?
#TMC में यह महाभारत पार्टी को दो हिस्सों में बांट सकता है। रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट मजबूत होता दिख रहा है। अगर ज्यादा विधायक क्रॉसओवर करते हैं, तो सुवेंदु सरकार और मजबूत हो जाएगी।
ममता बनर्जी अपनी पुरानी छवि – अजेय लड़ाकू – का सहारा ले रही हैं। उन्होंने काले कपड़े पहनकर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया और पोस्ट-पोल हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। लेकिन कार्यकर्ताओं और नेताओं में निराशा साफ है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि TMC की बची हुई ताकत बंगाल की ग्रामीण बेल्ट और मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर है। अगर ममता इसे संभाल लेती हैं, तो 2031 के चुनाव में वापसी संभव है। लेकिन अभी स्थिति बेहद नाजुक है।
निष्कर्ष
TMC में बवाल: दिल्ली की एक मुलाकात ने TMC को महाभारत में झोंक दिया। सिर्फ 13 दिनों में पार्टी की एकता चूर-चूर हो गई। ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता, अभिषेक का प्रभाव और संगठनात्मक कमजोरियां अब खुले तौर पर सामने हैं।
यह संकट TMC के लिए सबक भी है। बिना आंतरिक लोकतंत्र और युवा-पुराने नेताओं के संतुलन के कोई पार्टी लंबे समय तक नहीं टिक सकती। बंगाल की जनता अब देख रही है कि ममता यह तूफान पार कर पाती हैं या नहीं।
राजनीति अनिश्चित है। कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। लेकिन फिलहाल TMC में बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा।
आप क्या सोचते हैं? TMC में यह फूट स्थायी होगी या ममता इसे संभाल लेंगी? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।






