VP धनखड़ राधाकृष्णन मुलाकात उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की राधाकृष्णन से मुलाकात से सियासी गलियारों में हलचल मच गई है। बयान न देने से बढ़ रहा सस्पेंस, जानें इस मुलाकात के राजनीतिक मायने।

भारतीय राजनीति में हर छोटी-सी मुलाकात भी कई बार बड़ा राजनीतिक संदेश दे जाती है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) की पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन से प्रेरित विचारधारा वाले एक वरिष्ठ शिक्षाविद और राजनीतिक रणनीतिकार से निजी मुलाकात की खबर सामने आई। इस मुलाकात ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी, बल्कि इससे जुड़ी चुप्पी ने सस्पेंस को और गहरा कर दिया।
मुलाकात कैसे हुई और क्यों बना यह चर्चा का विषय
सूत्रों के अनुसार, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में एक शैक्षणिक सेमिनार के बाद कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों से मुलाकात की। बताया जा रहा है कि इसी कार्यक्रम के दौरान उनकी बातचीत पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन की विचारधारा से जुड़े एक वरिष्ठ विद्वान प्रो. राधाकृष्णननाथ के साथ हुई।
यह मुलाकात भले औपचारिक मानी जा रही हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल औपचारिक न मानकर संभावित राजनीतिक संकेत मान रहे हैं।
विशेष रूप से इस मुलाकात के तुरंत बाद विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएँ और मीडिया रिपोर्टों ने इसके मायने तलाशने शुरू कर दिए हैं। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि धनखड़ की यह पहल ‘राजनीतिक संतुलन’ और ‘सांकेतिक संवाद’ की दिशा में एक रणनीतिक कदम हो सकती है।
बयान की अनुपस्थिति से बढ़ा सस्पेंस
VP धनखड़ राधाकृष्णन मुलाकात: इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि न तो उपराष्ट्रपति कार्यालय की ओर से और न ही प्रो. राधाकृष्णननाथ की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया। आमतौर पर इस तरह की मुलाकातों के बाद कोई प्रोटोकॉल बयान या फोटो जारी किया जाता है, जो इस बार नहीं हुआ।
राजनीति में चुप्पी कई बार बयान से ज्यादा असरदार होती है। यही वजह है कि इस ‘नो कमेंट’ रवैये ने लोगों में जिज्ञासा बढ़ा दी है। सोशल मीडिया पर इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं—कुछ लोग इसे वैचारिक संवाद की पहल बता रहे हैं, तो कुछ इसे किसी बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जगदीप धनखड़ अपनी स्पष्टवादिता और बेबाक बोलचाल के लिए जाने जाते हैं। संविधान, न्यायपालिका और संसद के बीच संवाद के मसलों पर उनके रुख पहले भी सुर्खियों में रहे हैं।
ऐसे में राधाकृष्णन की शिक्षण और दार्शनिक परंपरा से जुड़े किसी व्यक्ति से मुलाकात को “विचार विमर्श” का हिस्सा माना जा सकता है। यह भी संभव है कि यह मुलाकात आने वाले माहौल में संसद के संचालन, शिक्षा नीति या वैचारिक दिशा से जुड़ी किसी पहल का संकेत हो।
- विशेषज्ञों द्वारा दिए जा रहे विश्लेषण में यह भी बताया गया
- कि 2026 के लोकसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में जब
- राजनीतिक दल अपनी नीतिगत रणनीतियाँ तय कर रहे हैं,
- ऐसे समय में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के कदमों पर स्वाभाविक रूप से नजरें रहती हैं।
सोशल मीडिया और जन प्रतिक्रिया
- ट्विटर (अब X) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह विषय कुछ ही घंटों में ट्रेंड करने लगा।
- #DhankharMeeting और #Radhakrishnan चर्चा का विषय बन गए।
- कई उपयोगकर्ताओं ने इसे एक
- “आध्यात्मिक-राजनीतिक संवाद” की संज्ञा दी, तो कुछ ने इसे “
- राजनीतिक समीकरणों का नया अध्याय” कहा।
- वहीं विपक्षी खेमे के समर्थकों ने व्यंग्य करते हुए पूछा कि क्या यह किसी नई भूमिका की तैयारी है।
आगे क्या संकेत मिल सकते हैं
- राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में यदि उपराष्ट्रपति की ओर से इस मुलाकात पर कोई टिप्पणी आती है,
- तो स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
- फिलहाल जो तस्वीर बन रही है, वह यही बताती है कि यह मुलाकात छोटी जरूर थी,
- लेकिन इसके असर का दायरा काफी व्यापक हो सकता है।
- यह भी संभव है कि इसे भारत की वैचारिक और शैक्षिक नीति से जोड़कर देखा जाए,
- खासकर ऐसे समय में जब ‘नई शिक्षा नीति 2020’ को लागू करने की दिशा में कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष
- जगदीप धनखड़ की इस मुलाकात ने यह साबित कर दिया कि
- भारतीय राजनीति में संवाद के स्तर पर हर गतिविधि का एक गहरा अर्थ होता है।
- बयान न आने से रहस्य जरूर बढ़ गया है,
- लेकिन यह भी तय है कि यह विषय जल्द ही राजनीति के मुख्य विमर्श का हिस्सा बनेगा।
- आने वाले हफ्तों में अगर कोई बयान या प्रतिक्रिया सामने आती है,
- तो यह तय रूप से बतलाएगा कि यह मुलाकात मात्र शिष्टाचार थी
- या इसके पीछे कोई बड़ा वैचारिक या राजनीतिक संदेश।










