कर्नाटक सियासत कर्नाटक की राजनीति इन दिनों कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं—मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार (DKS)—के इर्द-गिर्द घूम रही है। कर्नाटक सियासत सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती कांग्रेस हाईकमान के सामने हमेशा रही है, और 2023 के बाद बने समीकरण अब 2024–25 में और दिलचस्प हो गए हैं।
कर्नाटक सियासत सिद्दरमैया की कुर्सी क्यों सुरक्षित दिख रही है?

बड़े सामाजिक वर्गों पर मजबूत पकड़
सिद्दरमैया का आधार AHINDA (अल्पसंख्यक–दलित–पिछड़ा वर्ग) राजनीति है। यह कर्नाटक का सबसे बड़ा सामाजिक गठबंधन है, जिसने कांग्रेस को भारी बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
उनका जमीन से जुड़ा नेतृत्व और पिछड़े वर्गों में गहरी पैठ उन्हें पार्टी के लिए “अनिवार्य” बनाती है।
गारंटी योजनाओं का चेहरा
लक्ष्मी योजना, मुफ्त बस यात्रा, अन्न भाग्य—इन गारंटी स्कीम्स को जनता से भारी समर्थन मिला। हाईकमान इन योजनाओं को सिद्दरमैया की पहचान मानता है, इसलिए उन्हें हटाना राजनीतिक जोखिम होगा।
विपक्ष को काउंटर करने की क्षमता
BJP और JD(S) के संयुक्त हमलों का सिद्दरमैया मजबूती से मुकाबला कर रहे हैं। वे पुराने संघर्षशील नेता हैं और विधानसभा में सबसे मुखर चेहरा माने जाते हैं, जिससे कांग्रेस उनको विकल्प के रूप में बदलने की सोच भी नहीं पाती।
डी.के. शिवकुमार क्यों “रुके रह जाएंगे”?
गुटबाज़ी पर हाईकमान की सख्त नीति
DK शिवकुमार की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं, लेकिन कांग्रेस हाईकमान का साफ संदेश है—स्थिरता सर्वोच्च है।
CM बदले तो सरकार में अस्थिरता की आशंका बढ़ेगी, जिसे हाईकमान आने वाले चुनावों से पहले नहीं चाहता।
सत्ता-संगठन का संतुलन
DKS को प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जैसे दो पावर सेंटर दिए गए हैं। इससे पार्टी संतुलन दिखाने में सफल रही।
अगर उन्हें CM बनाया जाता है तो ये संतुलन टूटेगा, और अन्य OBC/SC/ST नेता असंतोष में आ सकते हैं।
भ्रष्टाचार व ED मामलों की पृष्ठभूमि
DKS की कानूनी चुनौतियाँ कांग्रेस के लिए जोखिम का कारण हैं। हाईकमान सरकार में किसी ऐसे नेता को शीर्ष पर नहीं रखना चाहेगा जिस पर केंद्र की एजेंसियाँ पहले ही निगाहें गड़ाए हुए हैं।
लिंगायत–ओबीसी–दलित समीकरण
DKS वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जो क्षेत्रीय रूप से मजबूत है लेकिन राज्यव्यापी वोटबैंक के स्तर पर सिद्दरमैया के AHINDA जितना व्यापक नहीं।
कांग्रेस ऐसे समय किसी एक जातीय ध्रुवीकरण के खतरे नहीं उठाना चाहती।
हाईकमान की रणनीति: “दोनों को साथ रखो” मॉडल
कांग्रेस में अक्सर दो बड़े नेता—एक CM, दूसरा संगठन या उपमुख्यमंत्री—का
फार्मूला अपनाया जाता है। कर्नाटक में यही मॉडल लागू है।
यह फार्मूला तीन कारणों से कांग्रेस के लिए काम कर रहा है:
- सरकार स्थिर है
- दोनों नेता अपने–अपने क्षेत्रों में लोकप्रिय हैं
- BJP–JD(S) को प्रभावी तरीके से चुनौती मिल रही है
आगे की राह: क्या बदलाव संभव है?
निकट भविष्य में—नहीं
सिद्दरमैया को हटाने का कोई संकेत नहीं है। हाईकमान चाहता है
कि 2028 चुनाव तक सरकार स्थिर रहे।
लंबी अवधि में—संभावना खुली है
यदि सिद्दरमैया स्वास्थ्य या उम्र के कारण पीछे हटते हैं, तब DKS की दावेदारी
फिर मजबूत हो सकती है, बशर्ते उनके कानूनी मामलों में राहत मिल जाए
और पार्टी एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर सके।
कर्नाटक में इस समय सियासी संतुलन सिद्दरमैया के पक्ष में है,
जबकि DK शिवकुमार इंतज़ार की राजनीति खेल रहे हैं।
कांग्रेस के लिए सत्ता और संगठन के बीच दोनों नेताओं की साझेदारी बेहद जरूरी है,
और फिलहाल यही मॉडल पार्टी की सबसे बड़ी मजबूती है।











