कर्नाटक हाईकोर्ट सहमति संबंध : कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि सहमति से बने रिश्ते का टूटना निराशा पर अपराध नहीं होता। जानिए कोर्ट के इस फैसले का सामाजिक और कानूनी मायने।
सहमति से बना रिश्ता और अदालत की संवेदनशील सोच
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है — अगर दो वयस्कों के बीच सहमति से रिश्ता बनता है और बाद में वह रिश्ता निराशा या मतभेद के कारण टूट जाता है, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत का यह निर्णय सिर्फ एक मामले का निपटारा नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती समझदारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में उठाया गया कदम है।

मामला क्या था?
यह मामला एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें उसने बताया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में रिश्ता तोड़ दिया। महिला ने इसे धोखाधड़ी और यौन शोषण का मामला बताया था। लेकिन जांच में सामने आया कि दोनों के बीच वर्षों तक प्रेम संबंध रहा था और उन्होंने आपसी सहमति से रिश्ता बनाया था।
अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत से ही दोनों पक्षों में सहमति थी और रिश्ता प्यार और विश्वास पर आधारित था, तो बाद में संबंध टूट जाना अपने आप में अपराध नहीं बनता। हर असफल रिश्ता ‘धोखेबाज़ी’ नहीं कहलाया जा सकता।
न्यायालय का विचार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि:
- सहमति से बने संबंध में अगर बाद में निराशा या मतभेद होता है, तो इसे आपराधिक कृत्य नहीं कहा जा सकता।”
- इस टिप्पणी में न केवल कानूनी दृष्टि झलकती है बल्कि भावनात्मक संवेदनशीलता भी। अदालत ने माना कि
- मानव संबंध स्थायी नहीं होते, और कभी-कभी परिस्थितियों या विचारों में बदलाव आने पर लोग अलग हो जाते हैं
- पर इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी ने अपराध किया है।
आधुनिक रिश्तों की वास्तविकता
- आज के दौर में रिश्ते पहले से कहीं अधिक खुले और जटिल हो चुके हैं। मोबाइल, सोशल मीडिया और
- स्वतंत्र जीवनशैली ने लोगों को नए साथियों से मिलने का अवसर तो दिया है,
- लेकिन साथ ही भावनात्मक अस्थिरता भी बढ़ा दी है।
- ऐसे में यह जरूरी है कि हम सहमति और समझ के बीच फर्क समझें।
- अगर कोई रिश्ता समान सहमति से शुरू हुआ है, तो उसके अंत को कानूनी अपराध की तरह नहीं देखा जाना चाहिए
- जब तक कोई ठोस धोखा या जबरदस्ती साबित न हो।
महिला और पुरुष – दोनों की जिम्मेदारी
- रिश्तों में जिम्मेदारी केवल पुरुष या महिला की नहीं होती। दोनों को यह समझना चाहिए कि भावनात्मक संबंध
- शारीरिक या मानसिक स्तर पर प्रभावित करते हैं। इसलिए रिश्ता बनाने से पहले परिपक्व सोच जरूरी है।
- कानूनी रूप से भी अदालतें चाहती हैं कि व्यक्ति अपने निर्णयों की जिम्मेदारी खुद लें—विशेषकर तब, जब रिश्ता आपसी सहमति से बना हो।
सहमति का अर्थ समझना जरूरी
- कई बार ‘सहमति’ को गलत समझ लिया जाता है। सहमति का अर्थ है दो वयस्कों की स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई
- अनुमति। किसी दबाव, झांसे या धोखे में दी गई सहमति कानून के नजर में वैध नहीं होती।
- लेकिन जब शुरुआत में सब कुछ पारदर्शी और सहमतिपूर्ण हो, और बाद में भावनात्मक मतभेद हो जाए
- तो यह ‘धोखा’ नहीं, एक ‘टूटे हुए रिश्ते’ की स्थिति मानी जानी चाहिए।
समाज में सोच में बदलाव की जरूरत
- कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला समाज को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हर व्यक्तिगत
- असफलता या ब्रेकअप को अदालत का मामला न बनाया जाए।
- अगर रिश्ता टूटने पर बदला लेने की भावना से एफआईआर की जाए, तो इससे न केवल अदालतों
- पर बोझ बढ़ता है बल्कि वास्तविक पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया भी धीमी होती है।
- समाज को यह समझना होगा कि हर रिश्ता या प्रेम कहानी का सुखद अंत नहीं होता।
- लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर टूटन में कोई अपराध छिपा है।
- कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला रिश्तों की परिपक्वता और व्यक्तिगत जीवन
की आज़ादी का समर्थन करता है। यह हमें सिखाता है कि:
- सहमति से बने संबंधों का सम्मान किया जाना चाहिए।
- असफल रिश्तों को बदले के जरिये नहीं, समझदारी से समाप्त किया जाना चाहिए।
- कानून का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जहाँ वास्तव में किसी की गरिमा या अधिकार का हनन हुआ हो।
यह निर्णय आधुनिक भारतीय समाज के लिए एक सकारात्मक सन्देश है—जहाँ संवेदनशीलता, परिपक्वता और पारस्परिक सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।











