कश्मीर में शराबबंदी कश्मीर घाटी में शराबबंदी का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्ण शराबबंदी की मांग को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आवास के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ समझौता नहीं होगा। अगर राजस्व की चिंता है तो बीजेपी कार्यकर्ता मस्जिदों के बाहर बैठकर भीख मांग लेंगे, लेकिन शराब की दुकानें नहीं चलने देंगे।
16 मई 2026 को श्रीनगर में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उमर अब्दुल्ला के आवास के बाहर प्रदर्शन किया। पुलिस ने हंगामे को नियंत्रित करने के लिए कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, लेकिन बाद में सभी को छोड़ दिया गया। बीजेपी ने चेतावनी दी है कि अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) सरकार ने शराबबंदी पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो पूरे कश्मीर में बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। यह प्रदर्शन दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड से लेकर उत्तर कश्मीर के करनाह तक फैलेगा।

कश्मीर में शराबबंदी बीजेपी का आक्रामक प्रदर्शन
बीजेपी नेता अल्ताफ ठाकुर ने कहा, “बीजेपी हर तरह के नशे और शराब के सेवन के सख्त खिलाफ है। NC सरकार जम्मू-कश्मीर के युवाओं को शराब की ओर धकेल रही है। कश्मीर सूफियों और संतों की भूमि है, यहां शराब की दुकानें नहीं चलने देंगे।”
- बीजेपी महासचिव अनवर खान ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला पर तीखा हमला बोला।
- उन्होंने कहा, “अगर शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व की इतनी चिंता है
- तो हम मस्जिदों के बाहर बैठकर भीख मांग लेंगे।
- लेकिन युवाओं के भविष्य के साथ खेलने की इजाजत किसी को नहीं देंगे।”
विवाद की जड़ क्या है?
मामला तब और तीखा हुआ जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में शराबबंदी की मांग को खारिज कर दिया। उन्होंने पीडीपी के तर्क को भी नकार दिया कि शराब की बिक्री बढ़ाने से सेवन बढ़ेगा। उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला ने पुरानी घटना का हवाला देते हुए कहा कि 1977 में शेख अब्दुल्ला ने भी शराबबंदी से इनकार किया था क्योंकि इससे राज्य को भारी राजस्व मिलता था। फारूक ने कहा, “अगर केंद्र सरकार राजस्व का नुकसान भरपाई कर दे तो बैन लग सकता है, लेकिन तस्करी रुक नहीं पाएगी।”
- इसके उलट बीजेपी का कहना है कि शराब युवाओं को बर्बाद कर रही है।
- कार्यकर्ताओं ने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के 100 दिवसीय नशामुक्ति अभियान पर भी सवाल उठाए।
- उन्होंने पूछा कि ड्रग्स के साथ शराब की बिक्री को भी क्यों शामिल नहीं किया गया?
नेशनल कॉन्फ्रेंस का पलटवार
- NC के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए
- कहा कि 2017 में पीडीपी-बीजेपी सरकार ने ही नई आबकारी नीति लागू की थी
- जिसमें नए इलाकों में भी शराब दुकानें खोलने का प्रावधान किया गया था।
- उन्होंने बीजेपी पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया।
शराबबंदी: सांस्कृतिक और सामाजिक नजरिया
कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान सूफियाना परंपरा, शांति और आध्यात्मिकता से जुड़ी है। बीजेपी का तर्क है कि शराब की दुकानें इस पहचान को नुकसान पहुंचा रही हैं। युवा पीढ़ी नशे की चपेट में आ रही है, जिससे बेरोजगारी, अपराध और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है।
दूसरी ओर NC सरकार राजस्व की दलील दे रही है। जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्र में पर्यटन और अन्य स्रोतों से आय बढ़ाने पर जोर देने की जरूरत है, बजाय शराब पर निर्भर रहने के।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
- कई सामाजिक कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ शराबबंदी का समर्थन करते हैं।
- शराब से जुड़ी बीमारियां, परिवारों का टूटना और युवाओं की बर्बादी किसी भी राजस्व से ज्यादा कीमत चुकाती है।
- गुजरात, बिहार और अन्य राज्यों के उदाहरण दिखाते हैं कि बैन के बावजूद चुनौतियां रहती हैं
- लेकिन सख्ती से लागू करने पर सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
आगे क्या?
बीजेपी ने दूसरे चरण के आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। अगर NC सरकार नहीं मानी तो पूरे घाटी में विरोध तेज हो सकता है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
कश्मीर के युवाओं का भविष्य दांव पर है। क्या शराबबंदी लागू होगी या राजस्व की भूख जीतेगी? समय बताएगा। लेकिन बीजेपी का प्रदर्शन साफ संदेश देता है – नशे के खिलाफ जंग जारी रहेगी।
कश्मीर में शराबबंदी का मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक है। बीजेपी का प्रदर्शन युवा सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। जनता की मांग है कि सरकार युवाओं को नशे से बचाए, न कि राजस्व के चक्कर में धकेले।
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