मायावती का UGC : उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशंस 2026 पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। नियम लागू होने के बाद सवर्ण समाज में भारी असंतोष है, जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे खुलकर समर्थन दिया है। उन्होंने विरोध करने वालों को जातिवादी मानसिकता वाला करार दिया और इसे घिनौनी राजनीति बताया। मायावती ने दलितों और पिछड़ों को सावधान रहने की सलाह भी दी।
UGC के नए नियमों का उद्देश्य और मुख्य प्रावधान
UGC ने 13 जनवरी 2026 को ये नियम जारी किए, जो 2012 की पुरानी गाइडलाइंस की जगह लेते हैं। मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:

- सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों-कॉलेजों में इक्विटी कमिटी (समता समिति), इक्विटी सेंटर और इक्विटी स्क्वॉड अनिवार्य।
- जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता या जन्म स्थान आधारित भेदभाव की शिकायतों के लिए 24×7 समता हेल्पलाइन।
- OBC छात्रों को भी जातिगत उत्पीड़न की परिभाषा में शामिल किया गया।
- शिकायतों की जांच, निगरानी और सख्त कार्रवाई; नियम न मानने पर मान्यता रद्द या फंड रोकने का प्रावधान।
- रोहित वेमुला, पायल तड़वी जैसे मामलों और बढ़ती शिकायतों (2019-2024 में 118% वृद्धि) के आधार पर ये नियम बनाए गए।
समर्थक इन्हें समावेशी शिक्षा और न्याय का कदम मानते हैं, जबकि विरोधी इसे सवर्णों के खिलाफ ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ और दुरुपयोग का खतरा बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर हो चुकी हैं, और UP, दिल्ली समेत कई जगह प्रदर्शन हो रहे हैं।
मायावती का स्पष्ट स्टैंड: जातिवादी मानसिकता का विरोध
बसपा प्रमुख मायावती ने X (पूर्व ट्विटर) पर सीरीज ऑफ पोस्ट में UGC नियमों का बचाव किया। उन्होंने लिखा:
“देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव के निराकरण और समाधान हेतु यूजीसी द्वारा सरकारी कॉलेज एवं निजी यूनिवर्सिटियों में भी ‘इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) बनाने के नए नियम के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के ही लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा है। जो इसे अपने विरुद्ध भेदभाव व षड्यंत्रकारी मानकर रहे हैं। यह कतई भी उचित नहीं है।”
- मायावती ने इसे घिनौनी राजनीति करार दिया और कहा कि स्वार्थी व बिकाऊ नेता दलितों-पिछड़ों
- के नाम पर भड़काऊ बयान देते हैं। उन्होंने अपील की:
- “ऐसे मामलों में दलितों व पिछड़ों को भी, इन वर्गों के स्वार्थी व बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ
- बयानों के बहकावे में कतई नहीं आना चाहिए। जिनकी आड़ में ये लोग आए दिन घिनौनी राजनीति करते रहते हैं।”
- वे नियमों के समर्थन में हैं, लेकिन सुझाव दिया कि लागू करने से पहले सभी वर्गों
- को विश्वास में लेना चाहिए, ताकि सामाजिक तनाव न बढ़े।
राजनीतिक परिदृश्य और प्रभाव
यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। मायावती ने सवर्ण विरोध को ‘नाजायज’ बताया, जबकि भाजपा के अंदर भी मतभेद हैं। कुछ भाजपा विधायकों और नेताओं ने विरोध जताया, इस्तीफे आए हैं। विपक्ष चुप है, लेकिन सवर्ण संगठन सड़कों पर हैं। छात्र यूनियन जैसे ABVP-NSUI चुप हैं, जबकि लेफ्ट ग्रुप AISA ने समर्थन किया।
UGC नियम उच्च शिक्षा में समानता लाने का प्रयास हैं, लेकिन विरोध से सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ा है। मायावती का बयान दलित-ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास लगता है, जबकि सवर्ण असंतोष भाजपा के लिए चुनौती।
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