बिहार टिकट घोटाला : भारतीय राजनीति में चुनाव से पहले टिकट का खेल हमेशा ही रोमांचक रहा है। इस बार मामला और भी दिलचस्प हो गया, जब चार प्रभावशाली विधायकों (MLA) को टिकट वितरण में भारी धोखाधड़ी का सामना करना पड़ा। पार्टी के अंदर मचे घमासान, बागी तेवरों से लेकर मौन विरोध और अचानक हुए ‘सरेंडर’ तक की यह कहानी राजनीति की चालबाजियों को उजागर करती है।
टिकट वितरण की गुत्थी कैसे बनी जंग का मैदान
जब विधानसभा चुनाव नजदीक आए, तो पार्टी हाईकमान ने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी की। लेकिन जैसे ही चार मौजूदा विधायकों के नाम सूची से बाहर हुए, पूरे संगठन में भूचाल आ गया। इनमें से तीन विधायक अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार रखते थे, जबकि चौथे को पार्टी की रणनीतिक सीट माना जा रहा था। ऐसी स्थिति में टिकट कटना किसी राजनीतिक साजिश से कम नहीं लगा।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह टिकट धोखाधड़ी किसी अंदरूनी गुटबाजी का परिणाम थी। कुछ नए चेहरे, जिन्होंने हाल ही में केंद्रीय टीम से नजदीकियां बढ़ाई थीं, उन्हें तरजीह दी गई। यही बात पुराने विधायकों को खटक गई, जिन्होंने इसे “विश्वासघात” और “संगठन के साथ धोखा” बताया।
बागियों का मौन विरोध: न बोलकर भी सब कह गए
टिकट कटने के बाद यह चारों विधायक पहले तो दिल्ली दरबार पहुंचे, लेकिन जब कोई समाधान नहीं मिला, तो उन्होंने ‘मौन’ का रास्ता अपनाया। न सोशल मीडिया पर टिप्पणी, न मीडिया बाइट—सिर्फ गहरी चुप्पी। लेकिन राजनीति में मौन अक्सर सबसे ताकतवर बयान होता है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं में चर्चा शुरू हो गई कि ये विधायक किसी अन्य पार्टी से संपर्क में हैं। लेकिन हकीकत कुछ अलग थी। ये बागी नेता दरअसल ‘समय का इंतजार’ कर रहे थे, ताकि संगठन को अपनी गलती खुद समझ में आए।
जनता में बढ़ी सहानुभूति
- चुनाव क्षेत्र में इन विधायकों को जनता की जबरदस्त सहानुभूति मिली। कई इलाके में पोस्टर लगे
- “हमारे MLA हमारे साथ हैं, टिकट नहीं जनादेश चाहिए।
- लोगों का यह जनसमर्थन पार्टी के लिए नया सिरदर्द बन गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
- कि जनता का यह भावनात्मक जुड़ाव आगामी वोटिंग पैटर्न को काफी प्रभावित कर सकता है।
अंदरूनी बैठकों में शुरू हुआ दबाव
- राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक, यह मामला अब गंभीर चर्चा का विषय बन गया। संगठन
- के वरिष्ठ नेताओं ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए इन बागी विधायकों से दोबारा संपर्क साधा।
- समय बीतने के साथ यह साफ हुआ कि पार्टी कोई और बड़ा नुकसान नहीं झेल सकती।
इस बीच, सोशल मीडिया पर #TicketScam और #BagiMLA जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि यह सिर्फ एक टिकट विवाद नहीं, बल्कि संगठनात्मक पारदर्शिता, विश्वसनीयता और एकजुटता पर सवाल खड़ा करता है।
सरेंडर या रणनीति?
- जब पार्टी ने डैमेज कंट्रोल की मुहिम शुरू की, तब बागियों के ‘सरेंडर’ की खबर सामने आई।
- लेकिन क्या यह सचमुच सरेंडर था? या फिर एक सोची-समझी रणनीति?
- जानकार बताते हैं कि ये विधायक भविष्य के राजनीतिक समीकरणों को देखकर समझदारी भरा कदम उठा रहे हैं।
- कुछ को सलाह दी गई कि फिलहाल पार्टी के साथ बने रहना बेहतर है, क्योंकि आने वाले समय में पुनर्विचार
- की संभावना बनी हुई है। वहीं कुछ ने अपने समर्थकों को यह भरोसा दिलाया कि वे अनदेखी के बावजूद राजनीति नहीं छोड़ेंगे।
भविष्य की सियासी कहानी यहीं से शुरू होती है!
- चार MLA की यह टिकट धोखाधड़ी और उनसे जुड़ी मौन-बागी कहानी आने वाले चुनावों में
- एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। यह पूरी घटना दिखाती है कि भारतीय राजनीति में टिकट सिर्फ
- एक कागज़ नहीं, बल्कि जनभावना, पार्टी वफादारी और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
- अगर इन बागियों की वापसी होती है, तो यह संगठन की परिपक्वता को दर्शाएगी।
- और यदि नहीं, तो संभव है कि आने वाले वक्त में यही विधायक
- किसी नए मंच या गठजोड़ से फिर सियासी मैदान में उतरें।
राजनीति का यह अध्याय बताता है कि मौन में भी संदेश होता है, और सरेंडर में भी रणनीति। चार MLA की यह टिकट धोखाधड़ी सिर्फ एक चुनावी कहानी नहीं, बल्कि सत्ता, सियासत और संघर्ष की वास्तविक तस्वीर है।












