GPS Spoofing in India : नई दिल्ली, 2 दिसंबर 2025 पिछले कुछ दिनों से देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों – दिल्ली (IGI), मुंबई (CSMIA) और बेंगलुरु (Kempegowda International) पर GPS Spoofing और Interference की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। पायलट्स को फाल्स लोकेशन सिग्नल मिल रहे हैं, जिससे नेविगेशन सिस्टम में गड़बड़ी हो रही है। एविएशन सेफ्टी के लिए यह नया और गंभीर खतरा बनकर उभरा है। आखिर क्या है GPS Spoofing, यह कैसे काम करता है और भारत में इसकी वजह क्या है? इस ब्लॉग में पूरी जानकारी हिंदी में।
GPS Spoofing क्या है? साधारण भाषा में समझिए
GPS Spoofing का मतलब है – किसी डिवाइस या एयरक्राफ्ट के असली GPS सिग्नल को जानबूझकर फेक (नकली) सिग्नल से बदल देना। असली सैटेलाइट की बजाय ग्राउंड से मजबूत फेक सिग्नल भेजे जाते हैं, जिससे एयरक्राफ्ट का नेविगेशन सिस्टम यह मान लेता है कि वह कहीं और है।

- उदाहरण: दिल्ली एयरपोर्ट के ऊपर उड़ रहे प्लेन को अचानक GPS दिखाने लगता है
- कि वह पाकिस्तान या ईरान के ऊपर है! पायलट्स को तुरंत बैकअप नेविगेशन सिस्टम
- (IRS – Inertial Reference System) पर स्विच करना पड़ रहा है।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में क्या हो रहा है?
- 28-30 नवंबर 2025 के बीच दिल्ली IGI एयरपोर्ट पर 20 से ज्यादा फ्लाइट्स ने GPS interference रिपोर्ट किया।
- मुंबई एयरपोर्ट पर लैंडिंग के समय कई पायलट्स को “GPS Signal Lost” या “False Location” अलर्ट मिले।
- बेंगलुरु में भी दक्षिण भारत से आने वाली फ्लाइट्स प्रभावित हुईं।
- DGCA और AAI ने सभी एयरलाइंस को अलर्ट जारी कर दिया है कि लैंडिंग से पहले IRS और ग्राउंड-बेस्ड नेविगेशन (VOR/DME) पर भरोसा करें।
GPS Spoofing के पीछे कौन है? 3 बड़े संदेह
- पाकिस्तान बॉर्डर से सिग्नल: विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब-राजस्थान बॉर्डर के पास से ये फेक सिग्नल आ रहे हैं। पहले भी भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध या तनाव के समय GPS jamming/spoofing की घटनाएं बढ़ी हैं।
- ईरान-इजरायल कॉन्फ्लिक्ट का असर: मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध की वजह से पूरे क्षेत्र में GPS spoofing बढ़ गया है। कई भारतीय फ्लाइट्स जो मिडिल ईस्ट से आती हैं, पहले से ही प्रभावित हो रही हैं।
- चाइना का हैंड?: कुछ रिपोर्ट्स में लद्दाख और अरुणाचल सेक्टर में चीनी PLA की GPS jamming यूनिट्स का जिक्र है।
एविएशन पर क्या असर पड़ रहा है?
- ऑटोमैटिक लैंडिंग (CAT III) में दिक्कत।
- फ्लाइट ट्रैकिंग ऐप्स (Flightradar24) पर प्लेन गायब दिखने लगते हैं।
- पायलट्स को मैनुअल नेविगेशन करना पड़ रहा है – सेफ्टी रिस्क बढ़ जाता है।
- अभी तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन विशेषज्ञ इसे “साइलेंट थ्रेट” बता रहे हैं।
भारत क्या कर रहा है इस खतरे से निपटने के लिए?
- ISRO का NavIC (IRNSS) सिस्टम तेजी से एयरक्राफ्ट्स में इंटीग्रेट किया जा रहा है। NavIC भारतीय सैटेलाइट्स पर आधारित है, इसलिए विदेशी स्पूफिंग से कम प्रभावित होता है।
- सभी नए एयरक्राफ्ट में Anti-Spoofing GPS Receivers लगाने का प्लान।
- DGCA ने एयरलाइंस को अनिवार्य किया है कि हर फ्लाइट में कम से कम 2 बैकअप नेविगेशन सिस्टम एक्टिव रखें।
- सेना और NTRO मिलकर सोर्स लोकेशन को ट्रैक कर रहे हैं।
आम लोगों को क्या करना चाहिए?
- अगर आप फ्लाइट बुक कर रहे हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। अभी तक कोई फ्लाइट क्रैश नहीं हुई है।
- पायलट्स पूरी तरह ट्रेंड हैं ऐसे हालात में मैनुअल लैंडिंग करने के लिए। लेकिन हां, थोड़ी देरी या डायवर्जन हो सकता है।
आने वाले दिनों में क्या होगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 तक ज्यादातर भारतीय कमर्शियल प्लेन NavIC से लैस हो जाएंगे। तब तक GPS spoofing एक बड़ी चुनौती रहेगी, खासकर उत्तरी और पश्चिमी भारत में।
निष्कर्ष: GPS Spoofing आज की तारीख में एविएशन का सबसे नया साइबर-फिजिकल खतरा है। अच्छी बात यह है कि भारत इसके लिए तैयार हो रहा है। NavIC इस समस्या का देसी इलाज साबित होगा। तब तक पायलट्स और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स की सतर्कता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।












