तुर्की का मुस्लिम नाटो : पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच उभरते सुरक्षा गठबंधन को कुछ विशेषज्ञ ‘मुस्लिम नाटो’ का नाम दे रहे हैं। यह गठबंधन तुर्की की मजबूत सैन्य शक्ति, पाकिस्तान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं तथा सऊदी अरब की आर्थिक ताकत को मिलाकर एक नई भू-राजनीतिक ताकत पैदा कर रहा है। भारत के लिए यह विकास बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दक्षिण एशिया से पश्चिम एशिया तक की सुरक्षा व्यवस्था को बदल सकता है। आइए जानते हैं इस गठबंधन की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति, भारत पर प्रभाव और क्या कदम उठाने चाहिए।
तुर्की का मुस्लिम नाटो गठबंधन की नींव और ऐतिहासिक संदर्भ
2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हस्ताक्षरित रणनीतिक रक्षा समझौते ने इसकी शुरुआत की। इस समझौते में नाटो के अनुच्छेद 5 जैसी व्यवस्था है, जहां एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। अब तुर्की की एंट्री से यह द्विपक्षीय गठबंधन त्रिपक्षीय बन सकता है। तुर्की नाटो का सदस्य है और अमेरिका के बाद सबसे बड़ी सेना रखता है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबद्धताओं में अनिश्चितता के कारण वह नए विकल्प तलाश रहा है।

ऐतिहासिक रूप से, तुर्की और पाकिस्तान के संबंध गहरे हैं। मई 2025 के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में तुर्की ने पाकिस्तान को सैकड़ों ड्रोन (बैरक्टार टीबी2) और प्रशिक्षित सैनिक उपलब्ध कराए, जो भारतीय सीमाओं पर तैनात किए गए। भारतीय खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कम से कम दो तुर्की ऑपरेटिव मारे गए। इसके अलावा, तुर्की पाकिस्तान की नौसेना और वायुसेना में सहयोग बढ़ा रहा है – जैसे बाबर-क्लास कोरवेट्स का निर्माण और 42 एफ-16 जेटों का अपग्रेड। 2024 में पाकिस्तान ने तुर्की से 50 मिलियन डॉलर से ज्यादा के हथियार आयात किए।
- सऊदी अरब की भूमिका वित्तीय और ऊर्जा-आधारित है। सुन्नी नेतृत्व की पुरानी प्रतिद्वंद्विता
- के बावजूद, तुर्की और सऊदी अब ईरान, सीरिया और क्षेत्रीय मुद्दों पर एकजुट हो रहे हैं।
- ब्लूमबर्ग रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्की को शामिल करने की बातचीत उन्नत स्तर पर है।
तुर्की की रणनीतिक महत्वाकांक्षा
तुर्की खुद को यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण एशिया को जोड़ने वाली केंद्रीय शक्ति के रूप में देखता है। यह गठबंधन पाकिस्तान को भारत के खिलाफ रणनीतिक गहराई देता है, जबकि सऊदी को विविध सुरक्षा गारंटी। पाकिस्तान की परमाणु क्षमताएं सऊदी रक्षा में शामिल हो सकती हैं, जो ईरान के खिलाफ संतुलन बनाती हैं। यह विकास अमेरिका की घटती भूमिका के बीच वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे का संकेत है।
भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां!
- #भारत इस गठबंधन को नजरअंदाज नहीं कर सकता। यह कश्मीर मुद्दे, क्षेत्रीय निरोधक और
- विस्तारित भू-राजनीति को प्रभावित करेगा। सेवानिवृत्त एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के अनुसार,
- “एक औपचारिक पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी त्रयी भारत की सुरक्षा को जटिल बनाएगी,
- भले ही तत्काल टकराव न हो।” यह इजराइल, आर्मेनिया, साइप्रस और ग्रीस जैसे देशों को भी चुनौती देगा।
- #भारत की पश्चिम एशिया में ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और प्रवासी हित प्रभावित होंगे।
- भूमध्य सागर से इंडो-पैसिफिक तक फैली प्रतिस्पर्धा में यह गठबंधन भारत के लिए नई जटिलताएं लाएगा।
- अमेरिका, नाटो, ईरान और रूस के साथ भारत के संबंध उलझ सकते हैं।
भारत की प्रतिक्रिया और रणनीतिक विकल्प
- #भारत को सक्रिय रहना चाहिए। इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी, ग्रीस और साइप्रस
- के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना जरूरी है। फ्रांस और अमेरिका जैसे सहयोगी संतुलन प्रदान कर सकते हैं।
- पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर अब भारत की मुख्य सुरक्षा चिंताओं का हिस्सा हैं।
तुर्की का ‘मुस्लिम नाटो’ में प्रवेश वैश्विक भू-राजनीति को बदल रहा है। भारत के लिए यह चेतावनी है कि पुरानी धारणाएं अब काम नहीं करेंगी। सतर्कता, मजबूत साझेदारियां और रणनीतिक संतुलन से ही हम इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
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