लिपुलेख पर नेपाल भारत-नेपाल सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने लिपुलेख दर्रे वाले मार्ग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस क्षेत्र से जुड़े किसी भी फैसले में नेपाल को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि यात्रा का रास्ता नेपाल के हिस्सों से होकर गुजरता है। यह बयान भारत में दिया गया है, जो विवाद को और तूल दे रहा है।

शिशिर खनाल का पूरा बयान
एएनआई से बातचीत में नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि कैलाश मानसरोवर यात्रा कई बॉर्डर पॉइंट्स से होती है, जिनमें से कई रूट नेपाल से गुजरते हैं। उन्होंने विशेष रूप से कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र को लेकर भारत-चीन के समझौते पर चिंता जताई। खनाल बोले, “हम बहुत लंबे समय से कह रहे हैं कि यह जमीन हमारी है।”
उन्होंने आगे कहा कि नेपाल की सहमति के बिना दोनों देश आपस में ऐसे समझौते नहीं कर सकते। नेपाल ने अपनी चिंताएं भारत और चीन दोनों को पहले ही बता दी हैं।
मानसरोवर यात्रा का महत्व और भारत-चीन समझौता
- कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए बेहद पवित्र है।
- चीन के तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की यह यात्रा धार्मिक महत्व रखती है।
- भारत और चीन के बीच संबंध सुधारने की कोशिशों के तहत लगभग 5 साल बाद पिछले साल यात्रा फिर शुरू हुई थी।
- विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल 2026 को घोषणा की कि इस साल जून से अगस्त तक यात्रा होगी।
- इसके लिए दो मुख्य मार्ग तय किए गए हैं:
- उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा
- सिक्किम का नाथू ला दर्रा
लिपुलेख मार्ग लंबे समय से मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक रास्ता रहा है। भारत का कहना है कि 1954 से इस क्षेत्र पर उसका प्रशासनिक नियंत्रण है।
भारत-नेपाल लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी
- यह विवाद मुख्य रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर है।
- नेपाल का दावा है कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार ये क्षेत्र काली नदी के पूर्व में हैं, इसलिए नेपाल का हिस्सा हैं।
- 2020 में नेपाल ने नया नक्शा जारी कर इन तीनों क्षेत्रों को अपना बताया।
- भारत ने नेपाल के दावे को हमेशा खारिज किया है।
- भारत स्पष्ट कहता है कि लिपुलेख उत्तराखंड का अभिन्न अंग है।
- नेपाल पहले भी कई बार इस मुद्दे पर आपत्ति जता चुका है। पिछले महीने नेपाल सरकार
- के प्रवक्ता सस्मित पोखरेल ने भी लिपुलेख पर अपना दावा दोहराया था।
नेपाल की मांग और भारत की स्थिति
- शिशिर खनाल ने कहा कि नेपाल भारत के साथ सीमा विवाद को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए
- सुलझाना चाहता है। उन्होंने तीसरे पक्ष (जैसे चीन या ब्रिटेन) के हस्तक्षेप को स्वीकार
- न करने की भारत की नीति का भी समर्थन किया।
- हालांकि, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पहले तीसरे पक्ष की मदद की बात कही थी
- जिसे भारत ने साफ तौर पर खारिज कर दिया था।
लिपुलेख पर नेपाल क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
- यह विवाद न सिर्फ सीमा सुरक्षा बल्कि धार्मिक यात्रा और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करता है।
- भारत के लिए लिपुलेख रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन सीमा से जुड़ा है।
- नेपाल के बयान से दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे तनाव में और इजाफा हो सकता है।
- भारत की विदेश नीति हमेशा द्विपक्षीय वार्ता पर जोर देती रही है। विशेषज्ञों का मानना है
- कि दोनों देशों को ऐतिहासिक तथ्यों, नक्शों और मौजूदा प्रशासनिक नियंत्रण
- के आधार पर मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए।
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का लिपुलेख पर बयान भारत-नेपाल संबंधों में नई बहस छेड़ गया है। मानसरोवर यात्रा जैसे धार्मिक मुद्दे पर राजनीतिक दावे दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई को बढ़ा सकते हैं। अब देखना यह होगा कि दोनों पड़ोसी देश इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाते हैं या विवाद और गहराता जाता है।







