पाकिस्तानी सेना ने उत्तरी वजीरिस्तान की मस्जिद पर बमबारी की, जिसमें दो पश्तून नागरिकों की मौत हुई। इस हमले ने स्थानीय समुदाय में गहरा आक्रोश फैला दिया है।
पाकिस्तानी सेना ने उत्तरी उत्तरी वजीरिस्तान में मस्जिद पर पाकिस्तान सेना का ड्रोन हमला; दो पश्तून नागरिकों की मौत, स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया
उत्तरी वजीरिस्तान के बनू जिले के डोमेल स्पार्का तहसील के स्पार्का गांव में पाकिस्तान सेना ने नमाज के वक्त मस्जिद पर ड्रोन हमला किया, जिसमें दो पश्तून नागरिकों की मौत हो गई। इस हमले के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया और भय का माहौल बन गया। पश्तून तहफुज़ मूवमेंट (पीटीएम) ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और इसे धार्मिक पवित्रता तथा मानवीय सम्मान पर हमला बताया है।
घटना की पूरी जानकारी क्या हुआ उत्तरी वजीरिस्तान में?

पाकिस्तानी सेना द्वारा उत्तरी वजीरिस्तान के डोमेल स्पार्का तहसील के एक गांव की मस्जिद पर बमबारी कर दी गई। घटना उस वक्त हुई जब लोग नमाज पढ़ रहे थे। हमले में दो निर्दोष पश्तून नागरिकों की मौत हो गई और कई घायल भी हुए। यह घटना सामने आने के बाद क्षेत्र में दहशत और आक्रोश दोनों फैल गए हैं।
स्थानीय लोगों में गुस्सा क्यों?
इस बर्बर कार्रवाई के बाद स्थानीय आबादी में सरकार और सेना के खिलाफ गहरा आक्रोश देखा गया। ग्रामीणों का कहना है कि आए दिन सेना के ऑपरेशनों का शिकार आम लोग, खासकर पश्तून समुदाय, बनते रहते हैं। मस्जिद जैसे पवित्र स्थान पर हमला करना, सभी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।
अन्तरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया व मानवाधिकार संगठन
पश्तून तहफुज मूवमेंट (पीटीएम) और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने निंदा करते हुए पाकिस्तान सरकार से सवाल पूछे हैं—ऐसे हमलों की कौन सी वैधता है? पीटीएम ने कहा कि यह पाकिस्तान द्वारा अपने ही नागरिकों के खिलाफ हिंसा का हिस्सा है और इसकी उच्चस्तरीय जांच की जानी चाहिए।
मस्जिद में हमला धार्मिक भावनाओं पर वार
मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए आस्था और एकता का केंद्र होती है।
ऐसे में नमाज के दौरान बमबारी से पूरे देश में धार्मिक और सामाजिक अशांति फैल गई है।
धार्मिक स्थलों पर इस तरह की कार्रवाई पर विशेषज्ञ भी गंभीर चिंता जता रहे हैं।
इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं
पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्र में पहले भी इसी तरह के सैन्य हमले देखने को मिले हैं,
जहां आम नागरिकों की मौत हुई है। हर बार सरकार और सेना विश्वास
बहाल करने की बातें करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात नहीं सुधरते।
पश्तून समुदाय का लगातार संघर्ष
पश्तून समुदाय खुद को हमेशा हिंसा व अन्याय का शिकार मानता आया है।
संघर्ष और सैन्य कार्रवाईयों ने उनके जीवन में न खत्म होने वाला डर बैठा दिया है।
पीटीएम और अन्य संस्थाएँ उनकी आवाज़ दूसरे देशों
और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।
क्या यह सिर्फ एक आतंरिक मामला है?
इस घटना के बाद बहस छिड़ गई है कि क्या पाकिस्तान में हो रही
ऐसी घटनाएँ देश के भीतर की कमजोरी हैं या फिर इसके पीछे कोई बड़ा एजेंडा है?
अंतरराष्ट्रीय दबाव, सरकार की जवाबदेही और सेना के संचालन पर अब वृहद सवाल उठ रहे हैं।






